देश में प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार सब्सिडी दे रही है, इंफ्रास्ट्रक्चर धीरे-धीरे सुधर रहा है और ऑटो कंपनियां भी लगातार नए मॉडल लॉन्च कर रही हैं. इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल वाहनों की बिक्री अभी भी सबसे आगे है, जबकि ईवी बिक्री काफी पीछे रह जाती है. ई-रिक्शा, ई-बस और छोटे कमर्शियल व्हीकल्स में थोड़ी ग्रोथ जरूर दिखती है, लेकिन यह ग्रोथ पेट्रोल-डीजल की तुलना में काफी कम है. आइए इसके पीछे की वजह जानते हैं.
पेट्रोल की तुलना में ईवी रजिस्ट्रेशन धीमा
- EnviroCatalysts की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में जनवरी से सितंबर तक 2.7 लाख पेट्रोल दोपहिया और सिर्फ 26,613 इलेक्ट्रिक दोपहिया रजिस्टर हुए. 2025 में इस दौरान पेट्रोल टू-व्हीलर की संख्या बढ़कर 3.2 लाख हो गई, जबकि इलेक्ट्रिक दोपहिया सिर्फ 27,028 ही रजिस्टर हुए. चार पहिया सेगमेंट में भी यही ट्रेंड दिखता है. पेट्रोल कारों की बिक्री सबसे ज्यादा रही, जबकि इलेक्ट्रिक फोर-व्हीलर केवल 3848 से बढ़कर 9905 तक पहुंचीं. tourist class की ईवी कारों की बिक्री तो इसके मुकाबले और भी कम रही-2024 में 1748 रजिस्ट्रेशन हुए थे, लेकिन इस साल सितंबर तक सिर्फ 466 दर्ज हुए. इससे साफ है कि EV की बिक्री बढ़ जरूर रही है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के मुकाबले बहुत धीमी है.
थ्री-व्हीलर और बस सेगमेंट में बढ़त
- थ्री-व्हीलर इलेक्ट्रिक वाहन पिछले साल के 8379 की तुलना में 2025 में 11,331 रजिस्टर हुए, लेकिन यात्री ई-ऑटो की संख्या में गिरावट देखी गई. ई-बसों की संख्या भी थोड़ी बढ़ी है, लेकिन डीजल बसों की बिक्री भी साथ-साथ बढ़ी, जिससे ईवी ग्रोथ उतनी बड़ी नहीं दिखती.
क्यों नहीं बढ़ रही ईवी की बिक्री?—ये हैं दो बड़े कारण
1. महंगे स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस
- ई-ऑटो और कई ईवी मॉडलों में कंट्रोलर, मोटर और बैटरी की कीमत बेहद ज्यादा होती है. कई मामलों में ये पार्ट्स 1 लाख रुपये से भी ज्यादा के होते हैं और यह खर्च आम वाहन मालिक या ऑटो ड्राइवर के लिए बहुत भारी पड़ता है. इसके विपरीत CNG गाड़ियों की मेंटेनेंस लागत काफी कम है, इसलिए लोग ईवी की बजाय CNG पसंद कर लेते हैं.
2. EV इंफ्रास्ट्रक्चर और नीतियों की कमी
- EnviroCatalysts के विश्लेषक सुनील दहिया के मुताबिक, भारत में EV बिक्री बढ़ाने के लिए मजबूत चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और स्पष्ट, स्थिर नीतियों व सब्सिडी सिस्टम का होना बेहद जरूरी है, क्योंकि अभी भी कई शहरों में चार्जिंग स्टेशन कम हैं और नीतियों में होने वाले बदलाव ग्राहकों को कंफ्यूज कर देते हैं.
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