New Car Depreciation Rate : आज जब कोई व्यक्ति अपनी पहली या नई कार घर लेकर आता है तो वो मूमेंट उसके लिए बेहद खास होता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस कार को लाखों रुपये खर्च करके खरीदते हैं, उसकी कीमत शोरूम से बाहर निकलते ही कम हो जाती है. कई मामलों में कार की वैल्यू पहले ही दिन 10 से 20 फीसदी तक गिर सकती है. ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में यह एक सामान्य प्रक्रिया है. कार खरीदने के बाद सिर्फ उसका यूज ही नहीं, बल्कि टैक्स, इंश्योरेंस, रजिस्ट्रेशन और बाजार की मांग जैसी कई चीजें उसकी कीमत को प्रभावित करती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि शोरूम से सड़क पर आते ही नई कार क्यों सस्ती हो जाती है और इसमें आखिर कितना घाटा होता है. 

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शोरूम से सड़क पर आते ही नई कार क्यों सस्ती हो जाती है?

जिस समय आप नई कार खरीदते हैं, वह ब्रांड न्यू कैटेगरी में होती है, लेकिन जैसे ही कार शोरूम से बाहर निकलती है और उसके नाम पर रजिस्ट्रेशन हो जाता है, वह यूज्ड कार यानी सेकेंड हैंड वाहन मानी जाने लगती है. हालांकि कार सिर्फ कुछ किलोमीटर ही चली हो, लेकिन बाजार में उसे नई कार की तरह नहीं बेचा जा सकता है. यही कारण है कि उसकी रीसेल वैल्यू तुरंत कम हो जाती है. 

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इसमें आखिर कितना घाटा होता है?

ऑटो एक्सपर्ट्स के मुताबिक नई कार खरीदने के तुरंत बाद उसकी कीमत में आमतौर पर 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. जैसे अगर किसी कार की ऑन-रोड कीमत 10 लाख रुपये है, तो शोरूम से बाहर निकलते ही उसकी अनुमानित बाजार कीमत 8 से 9 लाख रुपये के बीच रह सकती है. हालांकि यह हर मॉडल और ब्रांड के लिए अलग-अलग हो सकता है. कुछ लोकप्रिय मॉडल अपनी कीमत बेहतर तरीके से बनाए रखते हैं, जबकि कुछ गाड़ियों की वैल्यू तेजी से गिरती है.

इंश्योरेंस में गाड़ी की कीमत कम क्यों दिखाई जाती है?

नई कार खरीदने के तुरंत बाद इंश्योरेंस डॉक्यूमेंट में उसकी वैल्यू खरीद कीमत से कम दिखाई जाती है. दरअसल, बीमा कंपनियां वाहन का बीमा एक साल की अवधि के लिए करती हैं. इस दौरान वाहन के इंजन, टायर और अन्य हिस्सों में सामान्य घिसावट को ध्यान में रखा जाता है. इसी वजह से इंश्योरेंस की गणना करते समय वाहन की कीमत पर लगभग 5 प्रतिशत तक का डेप्रिसिएशन मान लिया जाता है. यही कारण है कि अगर आपने 1 लाख रुपये की बाइक खरीदी है, तो इंश्योरेंस पेपर में उसकी वैल्यू करीब 95 हजार रुपये दिखाई दे सकती है. 

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कौन-कौन से खर्च बढ़ा देते हैं कार की असली कीमत?

1. आरटीओ रजिस्ट्रेशन शुल्क - नई कार खरीदने के बाद उसका रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. इसके लिए आरटीओ शुल्क लिया जाता है. इसमें नंबर प्लेट, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और अन्य प्रशासनिक खर्च शामिल होते हैं.

2. रोड टैक्स - सड़क पर वाहन चलाने के लिए रोड टैक्स देना पड़ता है. यह टैक्स हर राज्य में अलग-अलग होता है. कई राज्यों में यह वाहन की एक्स-शोरूम कीमत का 3 प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक हो सकता है. 

3. वाहन बीमा- भारत में बिना इंश्योरेंस के वाहन चलाना कानूनी अपराध है. इसलिए नई कार खरीदते समय बीमा लेना जरूरी होता है. बीमा का प्रीमियम भी ऑन-रोड कीमत को बढ़ा देता है.

4.लॉजिस्टिक और हैंडलिंग चार्ज - वाहन को फैक्ट्री या वेयरहाउस से शोरूम तक पहुंचाने में भी खर्च आता है. कई बार यह लागत भी ग्राहक से वसूली जाती है. 

5. एक्सटेंडेड वारंटी और एक्सेसरीज - डीलर अक्सर एक्सटेंडेड वारंटी, सीट कवर, फ्लोर मैट, इंफोटेनमेंट एक्सेसरीज और मेंटेनेंस पैकेज जैसे अतिरिक्त ऑप्शन भी देते हैं. इनकी कीमत भी लास्ट बिल में जुड़ जाती है. 

क्या जीएसटी और टैक्स का पैसा वापस मिलता है?

नई कार खरीदते समय ग्राहक जीएसटी, रोड टैक्स और अन्य सरकारी शुल्क भी देता है, लेकिन जब कार सेकेंड हैंड के रूप में बेची जाती है, तो इन खर्चों का हिस्सा वापस नहीं मिलता है. यही वजह है कि रीसेल वैल्यू खरीद कीमत से काफी कम हो जाती है. हालांकि कार की कीमत में गिरावट कई बातों पर निर्भर करती है. जैसे ब्रांड की लोकप्रियता, मॉडल की मांग, ईंधन का प्रकार, वाहन की स्थिति, बाजार में नई कारों की उपलब्धता और यूज किए गए किलोमीटर. कुछ कारें 3-4 साल बाद भी अच्छी कीमत पर बिक जाती हैं, जबकि कुछ मॉडल बहुत तेजी से अपनी वैल्यू खो देते हैं. 

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