आज के समय में जब पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या बन चुका है, ऐसे में ऑटोमोबाइल कंपनियां ऐसे ऑप्शन तलाश रही हैं जो ज्यादा किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर हों. इसी कड़ी  में मारुति सुजुकी ने अपनी पॉपुलर कार Wagon R का हाल ही में एक नया वर्जन पेश किया है, जिसे Wagon R फ्लेक्स-फ्यूल कार कहा जाता है. यह कार भारत में एथेनॉल बेस्ड फ्यूल को बढ़ावा देने की दिशा में एक जरूरी कदम मानी जा रही है. 

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गाड़ी के शुरुआती सेल्स आंकड़ों ने सबको चौंका दिया, क्योंकि लॉन्च के कुछ ही हफ्तों में इस कार की सिर्फ 3 यूनिट ही बिक पाई हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बड़ी तकनीकी पहल के बावजूद यह कार बाजार में उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं चल पा रही है?

कैसे बनाया गया गाड़ी का इंजन?

Wagon R BioFlex को खास तौर पर ऐसे इंजन के साथ बनाया गया है जो अलग-अलग मात्रा में इथेनॉल फ्यूल पर चल सकता है. इसका मतलब यह है कि इसमें 85 फीसदी एथेनॉल और 15 फीसदी पेट्रोल वाला फ्यूल भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह तकनीक पर्यावरण के लिए बेहतर मानी जाती है क्योंकि एथेनॉल गन्ने जैसी फसलों से बनता है और इससे पेट्रोल की तुलना में कार्बन उत्सर्जन कम होता है. सरकार भी इसी वजह से देश में एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है ताकि कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो सके और किसानों को भी फायदा मिले. 

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इतनी मॉडर्न तकनीक होने के बावजूद इस कार की सेल बहुत कम रही है. इसका सबसे बड़ा कारण E85 फ्यूल की सीमित मौजूदगी है. पूरे देश में ऐसे पेट्रोल पंप बहुत कम हैं जहां E85 मिलता है और ज्यादातर पंप सिर्फ कुछ बड़े शहरों जैसे दिल्ली-एनसीआर और मुंबई तक ही सीमित हैं.

माइलेज हो सकता है कम

एक और बड़ी समस्या माइलेज और लागत को लेकर है. पेट्रोल और सीएनजी वाली Wagon R अपने अच्छे माइलेज के लिए जानी जाती है, लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन में एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता कम होने के कारण माइलेज थोड़ा कम हो सकता है. कंपनी ने अभी तक E85 पर इसका फाइनल माइलेज स्पष्ट रूप से जारी नहीं किया है, जिससे ग्राहकों में थोड़ी कंफ्यूजन बनी हुई है. जब किसी कार की रनिंग कॉस्ट साफ न हो तो लोग उसे खरीदने में हिचकिचाते हैं. 

सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ पेट्रोल पर नहीं, बल्कि E85 फ्यूल यानी 85 फीसदी इथेनॉल और 15 फीसदी पेट्रोल वाले मिश्रण पर भी आसानी से चल सकती है. एथेनॉल गन्ने जैसी फसलों से बनाया जाता है, इसलिए यह पेट्रोल की तुलना में ज्यादा ईको-फ्रेंडली माना जाता है. सरकार भी चाहती है कि भारत में धीरे-धीरे पेट्रोल की जगह एथेनॉल बेस्ड फ्यूल का इस्तेमाल बढ़े.

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