EV Battery Degradation Problem: अब भारतीय सड़कों पर पेट्रोल-डीजल कारों के अलावा इलेक्ट्रिक गाड़ियों का क्रेज भी तेजी से बढ़ रहा है. सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियों के बेहतरीन प्रयासों से देश भर में कई नए चार्जिंग स्टेशन खुल चुके हैं. जिससे चार्जिंग की बुनियादी टेंशन काफी हद तक खत्म हो गई है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईवी मालिकों के दिमाग में अब अपनी इलेक्ट्रिक कार को लेकर एक बड़ा सवाल सताने लगा है और यह बड़ी टेंशन है गाड़ी की 'बैटरी लाइफ' और उसकी अंदरूनी सेहत. 

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ईवी खरीदने वाले हर शख्स के दिमाग में यह डर बना रहता है कि कहीं बीच रास्ते में अचानक बैटरी धोखा न दे दे, या फिर समय से पहले बैटरी खराब हो गई तो लाखों रुपये का फटका लग जाएगा. तो चलिए जानतें हैं कि यह समस्या इतनी गंभीर क्यों है.

EV मालिकों की बढ़ रही है टेंशन

जानकारी के लिए आपको बता दें कि, इलेक्ट्रिक कार की कुल कीमत का लगभग 40 से 50 परसेंट हिस्सा सिर्फ उसकी बैटरी का होता है. इसका मतलब है कि अगर आपकी गाड़ी की बैटरी खराब होती है तो उसे बदलवाने का खर्च लगभग एक नई गाड़ी खरीदने जितना ही आ सकता है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि पारंपरिक बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम सिर्फ ऊपर-ऊपर से वोल्टेज और तापमान को मापता है. 

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जब तक बैटरी की परफॉर्मेंस एकदम से गिर नहीं जाती, तब तक अंदरूनी सेल्स में चल रही खराबी या शॉर्ट-सर्किट का पता ही नहीं चल पाता. यही वजह है कि कार मालिक हमेशा इस संशय में रहते हैं कि उनकी गाड़ी की बैटरी अंदर से कितनी कमजोर हो चुकी है. लेकिन इस समस्या से बचने के लिए कंपनियां लगातार इसका उपाय ढूंढ रही हैं.

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फास्ट चार्जिंग का साइड इफेक्ट

इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी की लाइफ कम होने के पीछे अत्यधिक गर्मी और बार-बार फास्ट चार्जिंग का इस्तेमाल करना सबसे बड़ा कारण माना जाता हैं. हालिया रिसर्च से पता चला है कि भारत जैसे गर्म इलाकों में गाड़ियों की बैटरी ठंडे इलाकों के मुकाबले ज्यादा तेजी से कमजोर होती है. जब तापमान 30 से 40 डिग्री के पार जाता है, तो बैटरी के अंदर इलेक्ट्रोकेमिकल रिएक्शन बहुत तेज हो जाते हैं, जिससे उसकी क्षमता घटने लगती है. 

इसके अलावा, हर बार 100% तक फुल चार्ज करना या डीसी फास्ट चार्जर का लगातार इस्तेमाल करना भी बैटरी पर एक्स्ट्रा दबाव डालता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स हमेशा 20 से 80 परसेंट तक ही चार्ज करने की सलाह देते हैं.

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