देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे वायरल हो रहे हैं. कहीं कहा जा रहा है कि इससे इंजन खराब हो जाएगा तो कहीं माइलेज कम होने की बात कही जा रही है. इसके अलावा कहीं चींटियां और मधुमक्खियां पेट्रोल टैंक पर जमा होने के वीडियो शेयर किए जा रहे हैं. अब इन सभी दावों पर पेट्रोलियम मंत्रालय से जवाब आ गया है. सरकार का मानना है कि E20 को लेकर फैलाए जा रहे कई दावे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है.
सरकार ने क्या कहा?
सरकार के मुताबिक, E20 कोई नया प्रयोग नहीं है. अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान और कई यूरोपीय देशों में वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है. भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और दिसंबर 2025 में 20 पर्सेंट एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर चुका है.
इंजन खराब होने के दावों पर जवाब
सरकार का कहना है कि ARAI, IOCL और SIAM समेत कई संस्थानों ने E20 पर लंबी टेस्टिंग की है. कारों को 40 हजार किलोमीटर और दोपहिया वाहनों को 20 हजार किलोमीटर तक चलाकर जांच की गई. परीक्षण में इंजन, स्टार्टिंग, ड्राइविंग और अधिकांश पार्ट्स में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई. सिर्फ कुछ पुराने वाहनों में रबर के कुछ पार्ट्स अपेक्षाकृत जल्दी बदलने पड़ सकते हैं.
क्या गाड़ियों का माइलेज घटता है?
सरकार मानती है कि माइलेज कई चीजों पर निर्भर करता है. इस पर ड्राइविंग स्टाइल, टायर प्रेशर, सर्विसिंग और ट्रैफिक जैसी परिस्थितियां भी असर डालती हैं. मंत्रालय का दावा है कि E20 से माइलेज में भारी गिरावट की बात सही नहीं है. उल्टा E20 बेहतर एक्सेलेरेशन और कम कार्बन उत्सर्जन में मदद करता है.
चींटियां और मधुमक्खियां क्यों नहीं आतीं?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर BPCL का कहना है कि फ्यूल ग्रेड एथेनॉल में कोई शुगर नहीं होती और इसमें ऐसे तत्व मिलाए जाते हैं, जो कीड़ों को दूर रखते हैं. ऐसे में E20 पेट्रोल की वजह से चींटियां या मधुमक्खियां पेट्रोल टैंक पर आने का दावा वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है.
सरकार ने गिनाए फायदे
सरकार के मुताबिक, 2014-15 से मई 2026 तक एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम से 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा बची. किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान हुआ. करीब 930 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन कम हुआ. 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जरूरत घटी.
गौरतलब है कि सरकार ने भले ही E20 को सुरक्षित और वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित बताया हो, लेकिन पानी की खपत, फीडस्टॉक, कृषि और पर्यावरण को लेकर बहस अब भी जारी है. ऐसे में आने वाले समय में E20 के वास्तविक प्रभावों पर लगातार निगरानी और independent अध्ययन भी अहम रहेंगे.
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