पेट्रोल में E20 यानी एथेनॉल मिलाने के बाद अब सरकार का फोकस CNG ब्लेंडिंग का है. इसके लिए केंद्र सरकार ने GOBARdhan यानी Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan योजना के तहत Bio-CNG या Compressed Biogas (CBG) को नेचुरल गैस के साथ मिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है.

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सरकार का टारगेट है कि आने वाले सालों में में देश में Bio-CNG का प्रोडक्शन कई गुना बढ़ाने के साथ ही नेचुरल गैस के इम्पोर्ट पर भी निर्भरता कम हो. ऐसे में आइए जानते हैं कि इस ब्लेंडिंग से गाड़ियों पर क्या असर पड़ने वाला है?

धीरे-धीरे ब्लेंडिंग बढ़ाएगी सरकार

  • सरकार ने Bio-CNG की ब्लेंडिंग को धीरे-धीरे बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. योजना के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में City Gas Distribution कंपनियों के लिए करीब 3 फीसदी Bio-CNG ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा गया है.
  • इसके बाद फाइनेंशियल ईयर 2027-28 में इसे बढ़ाकर 4 फीसदी किया जाएगा. वित्त वर्ष 2028-29 से आगे यह लक्ष्य 5 फीसदी तक पहुंचाने का प्लान है.
  • यह व्यवस्था केवल गाड़ियों को मिलने वाली CNG तक सीमित नहीं होगी, बल्कि City Gas Distribution नेटवर्क के जरिए घरों में सप्लाई होने वाली PNG पर भी इसका असर पड़ेगा.

क्या होगा गाड़ियों पर असर?

  • इस बदलाव की सबसे खास बात यह है कि CNG कार मालिकों को अपनी कार में कोई बड़ा बदलाव कराने की जरूरत नहीं होगी. Bio-CNG की प्रकृति प्राकृतिक गैस के समान होने के चलते मौजूदा CNG गाड़ियों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. यानी कार का इंजन, CNG टैंक या दूसरी तकनीक बदलने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए.

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  • ड्राइवर पहले की तरह CNG स्टेशन पर जाकर गैस भरवा सकेंगे. E20 के मामले में जहां पुराने पेट्रोल वाहनों की compatibility को लेकर चर्चा हुई, वहीं Bio-CNG ब्लेंडिंग में कार मालिकों के लिए बदलाव आसान रहने की उम्मीद है. 
  • सरकार ने इस योजना का ऐलान ऐसे वक्त पर किया है, जब लोग सीएनजी व्हीकल पर तेजी से स्विच कर रहे हैं. पिछले कुछ सालों में सीएनजी गाड़ियों की हिस्सेदारी बढ़ गई है. 

क्या है यह योजना?

  • GOBARdhan का पूरा नाम Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan है. इस पहल की शुरुआत साल 2018 में गांवों और कृषि क्षेत्रों से निकलने वाले जैविक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने के उद्देश्य से की गई थी.
  • इसके तहत पशुओं का गोबर, फसल का बचा हुआ हिस्सा, रसोई का जैविक कचरा, खाद्य कचरा और अन्य ऑर्गेनिक वेस्ट से बायोगैस, Bio-CNG और जैविक खाद तैयार की जा सकती है.

  • कहा जा सकता है कि जिस कचरे को आमतौर पर बेकार समझा जाता है, उससे फ्यूल और खाद दोनों तैयार किए जा सकते हैं. सरकार इसे ‘वेस्ट टू वेल्थ’ और सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में बड़ा कदम मान रही है.
  • Bio-CNG बनाने के लिए सबसे पहले गोबर और दूसरे जैविक कचरे को बायोगैस प्लांट में प्रोसेस किया जाता है. इससे निकलने वाली गैस को प्योर करके उसमें मौजूद गंदगी और कार्बन डाइऑक्साइड को कम किया जाता है.
  • इसके बाद मौजूद गैस में मेथेन की मात्रा काफी ज्यादा होती है और इसे कंप्रेस करके Compressed Biogas यानी CBG बनाया जाता है. इसकी केमिकल रिएक्शन नेचुरल गैस के काफी करीब होती है. इसी वजह से इसे CNG और PNG नेटवर्क में इस्तेमाल करने की उम्मीद है.  

क्या हो सकता है फायदा?

  • भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट से पूरा करता है. ऐसे में देश में तैयार होने वाली Bio-CNG की मात्रा बढ़ने से इम्पोर्ट्ड प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.
  • इससे विदेशी करेंसी की बचत भी हो सकती है और इंटरनेशनल गैस कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर कम किया जा सकता है.
  • इसके अलावा गोबर और कृषि अवशेष जैसे कचरे को खुले में फेंकने या जलाने की समस्या भी कम हो सकती है.
  • इस तरह यह योजना ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ कचरा प्रबंधन और पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

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