हाल ही में केंद्र सरकार ने सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 में बदलाव का प्रस्ताव देते हुए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है. इसका बड़ा मकसद देश में पेट्रोल के साथ ज्यादा मात्रा में एथेनॉल मिलाकर इस्तेमाल को बढ़ावा देना है. एथेनॉल एक तरह का बायोफ्यूल है, जो गन्ने, मक्का जैसे कृषि उत्पादों से बनाया जाता है. सरकार का मानना है कि इससे न सिर्फ पर्यावरण को फायदा होगा, बल्कि भारत की विदेशी तेल पर डिपेंडेंसी भी कम होगी. इसी के चलते नए नियमों का ड्राफ्ट तैयार किया गया है. 

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अभी भारत में E20 फ्यूल यानी 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल को लागू किया जा चुका है और धीरे-धीरे इसे पूरे देश में बढ़ाया जा रहा है. लेकिन अब सरकार इससे एक कदम आगे जाकर E85 (85% एथेनॉल) और E100 (लगभग पूरी तरह एथेनॉल) जैसे फ्यूल को भी मंजूरी देने की तैयारी कर रही है. इसके लिए मोटर व्हीकल नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है, ताकि भविष्य में ऐसी गाड़ियों का निर्माण और उपयोग संभव हो सके जो ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल पर चल सकें. 

क्या है एथेनॉल फ्यूल के फायदे?

इस पहल के पीछे कई बड़े उद्देश्य हैं. सबसे पहले भारत हर साल भारी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से इम्पोर्ट करता है, जिससे देश पर आर्थिक बोझ पड़ता है. अगर एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ता है तो इस इम्पोर्ट में कमी लाई जा सकती है.

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दूसरा एथेनॉल कृषि आधारित उत्पादों से बनता है, इसलिए इसकी मांग बढ़ने से किसानों को फायदा होगा और उनकी इनकम बढ़ सकती है.  तीसरा एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में कम पॉल्यूशन करता है, जिससे हवा की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है और पर्यावरण को भी राहत मिलेगी. 

ऑटोमोबाइल कंपनियों का क्या कहना?

इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं. ऑटोमोबाइल कंपनियों का कहना है कि ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल के लिए इंजन और फ्यूल सिस्टम में बदलाव जरूरी होगा, क्योंकि एथेनॉल की केमिकल प्रकृति पेट्रोल से अलग होती है. पुराने वाहन, जो अभी सड़कों पर चल रहे हैं, वे E85 या E100 जैसे फ्यूल के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं. इससे गाड़ी की परफॉर्मेंस और पार्ट्स पर असर पड़ सकता है इसलिए नई तकनीक वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की जरूरत पड़ेगी, जो अलग-अलग तरह के फ्यूल पर चल सकें.

सरकार ने फिलहाल इन नियमों को ड्राफ्ट के रूप में जारी किया है और आम जनता और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे हैं. इन सुझावों के आधार पर अंतिम नियम बनाए जाएंगे. इसका मतलब है कि अभी यह योजना शुरुआती चरण में है और इसे लागू करने से पहले कई तकनीकी, आर्थिक और व्यवहारिक पहलुओं पर विचार किया जाएगा.

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