Why Dry Fruits Grow In Afghanistan: भारत में जब भी त्योहारों और सर्दियों का मौसम आता है, तब बाजारों में मेवों (ड्राई फ्रूट्स) की मांग अचानक बढ़ जाती है. इनमें भी सबसे ज्यादा चर्चा होती है 'अफगानी मेवों' की. अफगानिस्तान के बादाम, अंजीर और पिस्ता  पूरी दुनिया में अपनी खास मिठास, बड़े आकार और बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो मेवे हम इतने महंगे दामों पर अफगानिस्तान से मंगवाते हैं, उनकी खेती भारत में क्यों नहीं हो पाती. आखिर अफगानिस्तान की मिट्टी और मौसम में ऐसा क्या जादू है जो भारत की मिट्टी और मौसम में नहीं है?

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अफगानिस्तान के मौसम का राज 

अफगानिस्तान के कंधार, हेरात और बामियान जैसे इलाकों में सर्दियों में बहुत तेज ठंड पड़ती है और गर्मियों में मौसम पूरी तरह सूखा और गर्म रहता है. मेवों के पेड़ों को पनपने के लिए सर्दियों में बर्फबारी या बहुत कम तापमान की जरूरत होती है, जो उन्हें वहां आसानी से मिलता है. अफगानिस्तान की हवा में नमी यानी उमस बहुत कम होती है। यह सूखा मौसम फलों को पेड़ों पर ही प्राकृतिक रूप से पकने और सूखने में मदद करता है. 

अफगानिस्तान की मिट्टी

दरअसल अफगानिस्तान की मिट्टी पहाड़ी और रेतीली है, जिसमें पानी जमा नहीं हो पाता. बादाम, पिस्ता और अखरोट के पेड़ों की जड़ों को ऐसा ही माहौल चाहिए होता है. अगर जड़ों में पानी रुक जाए तो पेड़ सड़ जाते हैं. साथ ही जहां इन सूखे मेवों की खेती होती है, वह जमीन अफगानिस्तान के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में है. जिससे वहां की मिट्टी और हवा प्रदूषित नहीं हो पाती हैं. इस वजह से फसलों में बीमारियां लगने का खतरा बहुत कम होता है. 

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भारत में इसकी खेती करना क्यों मुश्किल है?

ऐसा नहीं है कि भारत में मेवे की खेती नहीं होती. हमारे देश के कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बादाम और अखरोट की अच्छी खेती होती है. लेकिन अफगानिस्तान जैसी बड़े पैमाने पर और हर वैरायटी की खेती नहीं हो पाती है. क्योंकि भारत की जलवायु मानसूनी है, यहां बारिश बहुत ज्यादा होती है और हवा में नमी भी ज्यादा रहती है. यह उमस मेवों के पेड़ों के लिए काफी हानिकारक है, क्योंकि इससे फलों में फंगस या कीड़े लगने का डर रहता है.

भारत के ज्यादातर मैदानी इलाकों में सर्दियों में वैसी कड़क ठंड नहीं पड़ती, जैसी अफगानिस्तान के पहाड़ों में होती है और बिना कड़कती ठंड के मेवों के पौधे फल नहीं दे पाते. साथ ही, अफगानिस्तान में आज भी पुराने तरीकों से खेती होती है. वहां बड़े पैमाने पर केमिकल वाले खादों या कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. 

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