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मोती की खेती के लिए सरकार की इस स्कीम में मिलती है सब्सिडी, 11 लाख के निवेश से कमा सकते हैं 40 लाख

Pearl Farming Government Subsidy: खेती-किसानी में मुनाफा कम होने की वजह से अब किसान पर्ल फार्मिंग में किस्मत आजमा रहे हैं. सरकारी सब्सिडी से इस बिजनेस से 40 लाख तक कमाया जा सकता है.

Pearl Farming Government Subsidy: खेती और किसानी में पहले के मुकाबले अब किसानों को उतना मुनाफा नहीं मिल पा रहा है और यही वजह है कि अब किसान अलग-अलग चीजों की खेती में किस्मत आजमा रहे हैं. इसी कड़ी में आज हम आपको एक ऐसे ही धांसू बिजनेस मॉडल के बारे में बताने जा रहे हैं. जिसमें बंपर कमाई की जा रही है हम बात कर रहे हैं पर्ल फार्मिंग की जिसे आज के दौर में मोटी कमाई का सबसे सॉलिड जरिया माना जा रहा है. 

सबसे खास बात यह है कि इस बिजनेस को शुरू करने के लिए सरकार की तरफ से बहुत ही शानदार सब्सिडी का सपोर्ट मिलता है. जो शुरुआती लागत के बड़े बोझ को एकदम हल्का कर देता है. इसकी खेती से मात्र 11 लाख रुपये के शुरुआती निवेश के साथ 40 लाख रुपये के मुनाफा हासिल किया जा सकता है. जान लीजिए पूरा तरीका.

ऐसे शुरू करें मोती की खेती

मोती की खेती की शुरुआत करने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक तरीके से पूरी ट्रेनिंग लेनी होती है. जिससे नुकसान की गुंजाइश न रहे. इसके बाद प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी सरकारी स्कीम के तहत पर्ल फार्मिंग के लिए एक बड़ी रकम की सब्सिडी मिल जाती है. जिससे तालाब तैयार करने और सीप खरीदने का खर्च बहुत कम हो जाता है.

इस योजना में मिलती है सरकारी सब्सिडी 

इस बिजनेस मॉडल के तहत तालाब में लगभग 25 हजार सीपों को डालकर काम शुरू किया जाता है. मोती तैयार करने के लिए इन सीपों के अंदर एक छोटी सी न्यूक्लियस या बीड डाली जाती है और फिर उन्हें नेट बैग्स में रखकर पानी में छोड़ दिया जाता है. सरकार की ओर से पीएम मत्सय संपदा योजना के जरिए मिली आर्थिक मदद से यह पूरा बिजनेस बिना किसी आर्थिक तंगी के बहुत ही आसानी से चल पड़ता है.

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कम रिस्क में बंपर रिटर्न 

सीपों को तालाब के पानी में डालने के बाद लगभग 14 से 18 महीनों की सही देखरेख और फीडिंग के बाद चमचमाते हुए कीमती मोती बनकर तैयार हो जाते हैं. इस पूरी प्रोसेस में सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें रोज-रोज की हाड़-तोड़ मेहनत नहीं करनी पड़ती. बस पानी की क्वालिटी और सीपों की सेहत का ध्यान रखना होता है. 

मार्केट में मोतियों की तगड़ी डिमांड

जब ये मोती पूरी तरह तैयार होकर मार्केट में आते है. तो इनकी क्वालिटी के हिसाब से इन्हें बेहद ऊंचे दामों पर हाथों-हाथ खरीद लिया जाता है. ज्वैलरी डिजाइनर्स से लेकर बड़ी कंपनियों तक में इन मोतियों की भारी डिमांड रहती है. 11 लाख लगाकर 40 लाख का बंपर रिटर्न देने वाला यह बिजनेस आज के दौर का सबसे स्मार्ट और प्रॉफिटेबल मॉडल बन चुका है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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