Kiwi Farming: देश में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बागवानी फसलों की और भी किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है. इन्हीं फसलों में कीवी की खेती भी शामिल है जो पिछले कुछ वर्षों से किसानों के लिए कमाई का अच्छा ऑप्शन बन कर उभरी है. बाजार में कीवी की लगातार बढ़ती मांग और अच्छे कीमत मिलने के कारण अब कई किसान अपने फार्म हाउस पर बागानों में कीवी की खेती कर रहे हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही तरीके और तकनीक और शुरुआती वर्ष में सही देखभाल के साथ कीवी की खेती किसानों को लंबे समय तक अच्छा मुनाफा दे सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि फार्म हाउस पर आप कीवी की खेती कैसे कर सकते हैं. 

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इन राज्यों में तेजी से बढ़ रही कीवी की खेती 

भारत में कीवी की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, सिक्किम,अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, केरल और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में की जा रही है. पहाड़ी और ठंडी जलवायु वाले क्षेत्र में इसकी खेती ज्यादा सफल मानी जाती है. उत्तराखंड में भी किसानों के बीच इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है. इन क्षेत्रों में किसान कलमी पौधों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि इनमें अपेक्षाकृत जल्दी उत्पादन शुरू हो जाता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ग्रीन फ्लैश वैरायटी की खेती सबसे ज्यादा की जा रही है, जबकि गोल्डन और रेड फ्लैश किस्मों की मांग भी लगातार बढ़ रही है. 

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खेती के लिए कैसी जलवायु और मिट्टी चाहिए? 

कीवी की खेती के लिए ठंडी जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. सामान्य तौर पर समुद्र तल से 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र इसके लिए बेहतर रहते हैं. पौधारोपण के समय तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए, जबकि गर्मियों में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं होना चाहिए. मिट्टी की बात करें तो गहरी उपजाऊ और ज्यादा जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है.

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कीवी की पौध तैयार करने का तरीके 

कीवी का पौध तैयार करने के लिए बडिंग, ग्राफ्टिंग और लेयरिंग जैसी विधियों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि व्यवसायिक खेती के लिए अधिकांश किसान नर्सरी से तैयार हाई क्वालिटी वाले पौधे खरीदना पसंद करते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है की अच्छी क्वालिटी वाले पौध ही फ्यूचर में अच्छा उत्पादन देते हैं. 

ड्रिप सिंचाई से होता है फायदा 

हालांकि कीवी की फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन शुरुआती अवस्था में नियमित सिंचाई आवश्यक होती है. वहीं एक्सपर्ट्स ड्रिप इरिगेशन सिस्टम अपनाने की सलाह देते हैं, क्योंकि इससे पानी की बचत होती है और पौधों को आवश्यक मात्रा में नमी मिलती रहती है. गर्मी के मौसम में समय पर सिंचाई करना जरूरी होता है. वहीं खेती में जल भराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों में सड़न और दूसरी फफूंदी जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है. 

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