Sugarcane Farming in Mountains: देशभर में कई किसान अब गन्ने की खेती करके भी अच्छी कमाई कर रहे हैं. आमतौर पर गन्ने को मैदानी इलाके की फसल मानी जाती है, लेकिन अब पहाड़ी क्षेत्र में भी इसकी पहचान बन रही है. अब पहाड़ी क्षेत्र के लोग भी उन्नत किस्म के बीज लाकर गन्ने की खेती कर रहे हैं. गन्ने की खेती से पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की कमाई भी बढ़ रही है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि पहाड़ों पर गन्ने की खेती करते समय कौन सी पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे उत्पादन भी बढ़ेगा और कमाई भी बढ़ेगी. 

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सही जलवायु और मिट्टी का चयन करें 

गन्ना गर्म और नम जलवायु की फसल है, इसके बेहतर विकास के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है. गन्ने की खेती के लिए पहाड़ी क्षेत्र में ऐसी जगह का चयन करना चाहिए, जहां पर्याप्त धूप मिले और पानी की निकासी अच्छी हो. गन्ने की खेती के लिए दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी सही मानी जाती है, जिसका पीएच मान 6 से 7.5 के बीच हो. 

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सीढ़ीनुमा खेत की करें गहरी जुताई

पहाड़ी क्षेत्र में समतल जमीन कम होती है, इसलिए सीढ़ीनुमा खेत तैयार करना अच्छा ऑप्शन है. ऐसे में खेत की कम से कम दो बार गहरी जुताई करें और मिट्टी को भुरभुरी बना दें. इससे गन्ने की जड़ें गहराई तक जाती है और पौधों को पर्याप्त पोषण तत्व मिलते हैं. कई किसान अब पाउडर वीडर और दूसरे आधुनिक कृषि यंत्र की मदद से भी पहाड़ी जमीन को खेती योग्य बना रहे हैं. 

उन्नत और रोग मुक्त बीज का इस्तेमाल करें 

अच्छे उत्पादन के लिए स्वास्थ्य और रोग मुक्त बीज का चयन करना बहुत जरूरी है. एक्सपर्ट्स के अनुसार 9 से 10 महीने पुराने हेल्दी गन्ने के ऊपरी दो-तिहाई हिस्से के बीज के रूप में उपयोग करना चाहिए. बीज की आंखें पूरी तरह विकसित और हेल्दी होनी चाहिए. बुवाई से पहले बीज का उपचार करने से लाल सड़न जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है. 

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ट्रेंच या नाली विधि से करें बुवाई 

पहाड़ी क्षेत्र में नाली विधि से गन्ने की बुवाई ज्यादा लाभकारी मानी जाती है. इसमें 20 से 25 सेंटीमीटर गहरी और लगभग 1 फीट चौड़ी नालियां बनाई जाती है. एक किस से दो आंख वाले बीज टुकड़ों की बुवाई करने से जमाव बेहतर होता है और पौधों का विकास भी तेज होता है. इसके अलावा गन्ने की पंक्तियों की दूरी 90 सेंटीमीटर तक रखने से फसल को पर्याप्त जगह मिलती है. 

सिंचाई पर ध्यान दें 

गन्ना लंबे समय की फसल है, इसलिए इसे नियमित नमी की जरूरत होती है. पहाड़ी क्षेत्र में उपलब्ध जल सोर्स का उपयोग कर सिंचाई की उचित व्यवस्था करनी चाहिए. खेत की अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट मिलना फायदेमंद रहता है. साथ ही ट्राईकोडर्मा जैसे जैविक उत्पादन का उपयोग मिट्टी और फसल को रोगों से बचाने में मदद करता है.

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