Vallabh Ashwagandha-1: बंपर पैदावार और मुनाफा देगी अश्वगंधा की ये किस्म, खरीफ सीजन में कर सकते हैं बुवाई
Vallabh Ashwagandha-1: पारंपरिक खेती से नई फसलों की तरफ जाने के बीच डायरेक्शन ऑफ मेडिकल एंड एरोमेटिक प्लांट्स रिसर्च की ओर से विकसित वल्लभ अश्वगंधा-1 किस्म किसानों के बीच चर्चा में है.

Vallabh Ashwagandha-1: खेती में बदलते दौर के साथ अब किसान सिर्फ गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर नहीं रह रहे हैं बल्कि वह ऐसी फसलों की खेती शुरू कर रहे हैं जिनमें कम खर्च और मुनाफा बेहतर मिलता है. इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों में औषधीय फसलों की खेती भी तेजी से बढ़ी है. इनमें अश्वगंधा किसानों के लिए एक बड़े ऑप्शन के तौर पर सामने आई है.
आयुर्वेदिक दवाओं, हेल्थ सप्लीमेंट्स और हर्बल प्रोडक्ट्स में इसकी बढ़ती मांग ने से बाजार में मजबूत पहचान दिलाई है. ऐसे में चलिए अब हम आपको बताते हैं कि बंपर पैदावार और मुनाफा अश्वगंधा की कौन सी किस्म देती है और खरीफ के सीजन में इसकी कैसे बुवाई कर सकते हैं.
अश्वगंधा की यह किस्म देती है बंपर पैदावार
पारंपरिक खेती से नई फसलों की तरफ जाने के बीच डायरेक्शन ऑफ मेडिकल एंड एरोमेटिक प्लांट्स रिसर्च की ओर से विकसित वल्लभ अश्वगंधा-1 किस्म किसानों के बीच चर्चा में है. यह उन्नत किस्म कम लागत में बेहतर उत्पादन देने के लिए जानी जाती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार खरीफ सीजन में इसकी बुवाई किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है. खास बात यह है कि इसकी खेती कम पानी और सीमित संसाधनों में की जाती है. इसके अलावा इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी पैदावार भी मानी जाती है जानकारी के अनुसार यह किस्म प्रति हेक्टेयर करीब 589.4 किलोग्राम सूखी जड़ का उत्पादन दे सकती है. अश्वगंधा की जड़ों की बाजार में अच्छी मांग रहती हैं, क्योंकि इनका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाई और इम्युनिटी बढ़ाने वाले उत्पादों में बड़े स्तर पर किया जाता है. जानकारों का कहना है कि अगर किसान सही तरीके, तकनीक और देखभाल के इसकी खेती करें तो एक एकड़ में अच्छी कमाई की जा सकती है.
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संतरी रंग के फलों से होगी आसान पहचान
इस किस्म की पहचान खेत में आसानी से की जा सकती है. वल्लभ अश्वगंधा-1 के पौधों में संतरी रंग के फल लगते हैं, जिससे किसान फसल की शुद्धता आसानी से बनाए रख सकते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार उत्पादन और स्वस्थ वृद्धि के कारण व्यवसायिक खेती के लिए भरोसेमंद मानी जा रही है. वहीं एक्सपर्ट्स के अनुसार गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश की जलवायु इस फसल के लिए काफी अनुकूल मानी जाती है. कम बारिश और शुष्क मौसम वाले इलाकों में भी इसकी खेती अच्छी तरह की जा सकती है. यही वजह है कि सूखा प्रभावित क्षेत्र के किसानों के लिए यह फसल अच्छा ऑप्शन बन रही है.
कम लागत में टिकाऊ खेती
अश्वगंधा की खेती में पारंपरिक फसलों के मुकाबले कम लागत आती है. इसमें ज्यादा सिंचाई और भारी मात्रा में रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती है. खेत में अच्छी जल निकासी हो और पानी का जमाव न हो तो यह फसल बेहतर उत्पादन देती है. वहीं कृषि एक्सपर्ट्स के अनुसार हल्की रेतीली और दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है. 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में इसका विकास अच्छा होता है. वहीं अश्वगंधा की बुवाई खरीफ सीजन में की जाती है. जून से जुलाई और कई क्षेत्र में सितंबर-अक्टूबर तक इसकी बुवाई उपयुक्त मानी जाती है.
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