आज के वक्त में बहुत से किसान डेयरी बिजनेस खोलकर अच्छी कमाई कर रहे हैं. डेयरी बिजनेस में दूध और दूसरे प्रोडक्ट्स से अच्छी कमाई तो होती है. लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा चारे के खर्च के तौर पर चला जाता है. और इससे मुनाफा काफी कम रह जाता है. छोटे किसानों के लिए रोजाना हरा चारा खरीदना जेब पर भारी पड़ता है. ऐसे में अगर खेत में ऐसी फसलें उगाई जाएं जिनसे पशुओं के लिए हरे चारे का इंतजाम भी हो जाए तो खर्च काफी हद तक कम किया जा सकता है. 

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किसान अपनी जरूरत के हिसाब से खेत के एक हिस्से में चारा देने वाली फसलें लगा सकते हैं. इससे बाजार से चारा खरीदने पर होने वाला खर्च कम होज जाएगा और पशुओं को ताजा हरा चारा भी मिलता रहेगा. अच्ची बात यह है कि कई चारा फसलों की खेती के लिए बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होती. खेत की मेड़ या किसी खाली हिस्से  में भी इनकी खेती की जा सकती है. यही वजह है कि डेयरी फार्मिंग वाले किसान अब इन फसलों को खूब उगा रहे हैं. 

ज्वार और मक्का से मिलेगा हरा चारा

अगर किसान गर्मी और खरीफ के दौरान पशुओं के लिए हरे चारे का इंतजाम करना चाहते हैं तो ज्वार और मक्का काम की फसलें हैं. दोनों फसलों को चारे के लिए अलग से उगाया जा सकता है. ज्वार तेजी से बढ़ने वाली फसल है और इसकी हरी पत्तियां पशुओं के लिए उपयोगी चारा देती हैं. वहीं मक्का की हरी फसल भी गाय और भैंस को खिलाई जाती है. इन फसलों को खेत के उस हिस्से में लगाया जा सकता है जहां किसान अनाज वाली मुख्य फसल नहीं लगाना चाहते. 

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इससे जमीन का बेहतर इस्तेमाल होता है. हरे चारे रेगुलर मिलता रहता है तो फिर पशुपालक को बाहर से चारा खरीदने की जरूरत नहीं होती है. हालांकि चारा फसल काटते समय उसकी उम्र का ध्यान रखना जरूरी है. बहुत कम उम्र की फसल खिलाने से बचना चाहिए और पशुओं को संतुलित मात्रा में चारा देना चाहिए. हरे चारे के साथ सूखा चारा और दाना भी आहार का हिस्सा रखना जरूरी है. 

बरसीम की खेती से लंबे समय तक मिलेगा हरा चारा

सर्दियों के मौसम में बरसीम पशुओं के लिए बेहतरीन हरे चारे वाली फसल मानी जाती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक बार खेत में फसल तैयार होने के बाद किसान कई कटिंग ले सकते हैं. इससे गाय और भैंस के लिए लंबे समय तक हरे चारे का इंतजाम बना रहता है. बरसीम में प्रोटीन की मात्रा भी अच्छी होती है इसलिए इसे डेयरी पशुओं की डाइट में शामिल किया जाता है. इसकी खेती के लिए खेत की अच्छी तैयारी जरूरी है. 

जमीन में पर्याप्त नमी रहे तो फसल की ग्रोथ अच्छी होती है. किसान बरसीम को गेहूं और दूसरी रबी फसलों के साथ अपने फसल चक्र में शामिल कर सकते हैं. इससे खेत का इस्तेमाल भी बेहतर तरीके से हो जाता है और पशुओं के लिए चारे की जरूरत भी पूरी होती रहती है. सबसे बड़ा फायदा यही है कि हर दिन बाजार से हरा चारा खरीदने की जरूरत नहीं रहती है.

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नेपियर घास से सालभर चारे की चिंता नहीं होगी

डेयरी किसानों के बीच नेपियर घास काफी पाॅपुलर है. इसे एक बार लगाने के बाद अच्छी देखभाल के साथ कई बार काटकर चारे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. यही वजह है कि जिन किसानों के पास पशुओं की संख्या ज्यादा है उनके लिए यह काफी सही ऑप्शन बन सकती है. नेपियर की खासियत इसकी तेज बढ़वार है. खेत में पर्याप्त नमी और पोषण मिलने पर यह जल्दी तैयार होती है. किसान इसे खेत की मेड़, खाली जमीन या अलग चारा प्लॉट में लगा सकते हैं. 

कटाई के बाद दोबारा बढ़ने की क्षमता होने के चलते बार बार नई बुवाई की जरूरत नहीं पड़ती.पशुओं को नेपियर खिलाते समय इसे काटकर दूसरे चारे के साथ मिलाकर देना बेहतर रहता है. ध्यान रखें कि सिर्फ एक ही तरह के हरे चारे पर पशुओं की पूरी डाइट निर्भर नहीं होनी चाहिए. हरा चारा, सूखा चारा और जरूरत के मुताबिक दाना मिलाकर देने से पशुओं को एकदम सही पोषण मिलता है.

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