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तेल और गैस संकट के बीच खाद संकट की सता रही चिंता, किसान भाइयों को परेशान कर देगी ये खबर

Farmers News: ग्लोबल ट्रेड रूट में मची हलचल और गैस की किल्लत ने अब खेती की नींव हिला दी है. खाद के प्रोडक्शन और सप्लाई पर मंडराते इस खतरे ने किसानों की टेंशन बढ़ा दी है.

Farmers News: दुनियाभर में चल रही सियासी खींचतान और ट्रेड रूट में मचे घमासान ने अब भारतीय किसानों के दरवाजे पर दस्तक दे दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते तनाव ने न केवल तेल और गैस की सप्लाई चेन को हिला कर रख दिया है. बल्कि इसने खाद यानी फर्टिलाइजर के ग्लोबल संकट की आहट भी दे दी है.

FAO के चीफ इकोनॉमिस्ट ने चेतावनी दी है कि अगर ये हालात नहीं सुधरे. तो आने वाले दिनों में खाद की किल्लत और इसकी आसमान छूती कीमतें खेती-किसानी को बेहाल कर सकती हैं. यह खबर उन किसान भाइयों के लिए किसी बड़ी टेंशन से कम नहीं है. जो अपनी अगली फसल की तैयारी में जुटे हैं.

ट्रेड कॉरिडोर में फंसी खाद की सप्लाई चेन

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का वो सबसे खास समुद्री रास्ता है. जहां से ग्लोबल फर्टिलाइजर मार्केट का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है. इस रूट में जरा सी भी रुकावट का मतलब है कि खाद की खेप समय पर बंदरगाहों तक नहीं पहुंचेगी. जब शिपिंग रूट्स ब्लॉक होते हैं या उनमें देरी होती है. तो खाद की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट यानी ढुलाई का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह सप्लाई चेन ज्यादा समय तक बाधित रही. तो यूरिया और डीएपी जैसी जरूरी खाद की कमी होना तय है. भारत जैसे देश के लिए जो खाद के लिए काफी हद तक इम्पोर्ट पर निर्भर है. यह स्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.

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गैस की कमी और खाद प्रोडक्शन का गहरा कनेक्शन

खाद का संकट सिर्फ जहाजों के फंसने तक सीमित नहीं है. बल्कि इसका सीधा कनेक्शन गैस से भी है. फर्टिलाइजर प्लांट्स को चलाने और यूरिया बनाने के लिए नेचुरल गैस सबसे जरूरी कच्चा माल है. तेल और गैस संकट की वजह से जब गैस की कीमतें बढ़ती हैं या उसकी सप्लाई कम होती है. 

तो खाद बनाने वाली फैक्ट्रियां अपना प्रोडक्शन कम करने पर मजबूर हो जाती हैं. जब दुनिया भर में खाद का उत्पादन गिरेगा, तो इसकी मार सीधे हमारे किसानों की जेब पर पड़ेगी. खाद की कमी होने पर ब्लैक मार्केटिंग का डर बढ़ जाता है और किसानों को मजबूरी में महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं. जिससे पूरी फसल का बजट ही बिगड़ जाता है.

फूड सिक्योरिटी पर मंडराता खतरा

इस संकट का असर सिर्फ खाद तक नहीं रहेगा. बल्कि यह धीरे-धीरे पूरी फूड सिक्योरिटी यानी खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है. अगर किसानों को सही समय पर और सही दाम में खाद नहीं मिली. तो पैदावार कम होगी और मार्केट में अनाज के दाम बढ़ जाएंगे. 

इससे बचने के लिए अब वक्त आ गया है कि हम रसायनिक खाद पर अपनी निर्भरता थोड़ी कम करें और नैनो यूरिया या ऑर्गेनिक खाद जैसे विकल्पों को अपनाएं. सरकार को भी बफर स्टॉक और वैकल्पिक व्यापारिक रास्तों पर तेजी से काम करना होगा जिससे देश के किसानों को ग्लोबल मार्केट की इस उथल-पुथल की वजह से नुकसान न सहना पड़े. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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