खेती में अच्छी फसल और बंपर पैदावार के लिए मौसम का किसानों के हित में होना बहुत जरूरी है. कई बार मौसम किसानों पर मेहरबान होता है और समय पर बारिश से खेत लहलहा उठते हैं. तो कई बार यही मौसम उनका सबसे बड़ा दुश्मन भी बन जाता है. कभी सूखा, कभी बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. ऐसे में पुराने तरीकों से सिर्फ एक फसल को उगाना किसानों के लिए फायदेमंद नहीं है

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अब खेती में एक नया बदलाव आ रहा है. जिससे किसान मौसम की मार से पूरी तरह बच रहे हैं. इस बेहतरीन तकनीक का नाम है क्लाइमेट स्मार्ट इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम यानी एकीकृत कृषि मॉडल. यूपी के कई इलाकों के किसान इस तकनीक को अपनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं.  अगर आप भी मौसम के होने वाले नुकसान के डर को कम करना चाहते हैं. तो खेती का यह तरीका अपना लें.

क्या है क्लाइमेट स्मार्ट इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल?

इंटीग्रेटेड फार्मिंग को आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है एक ही जमीन पर खेती से जुड़े कई काम साथ-साथ करना. इसमें किसान सिर्फ गेहूं और धान जैसी फसलों के भरोसे ही नहीं रहते. बल्कि खेत के हिसाब से सब्जियां, फल, डेयरी, मछली पालन या मुर्गी पालन भी जोड़ सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर मौसम की वजह से एक फसल को नुकसान होता है. तो बाकी कामों से कमाई जारी रहती है. 

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से तेज बारिश से अनाज की फसल खराब हो गई तो सब्जियों, दूध, अंडे और दूसरी चीजों से आमदनी मिल सकती है. इस मॉडल में एक काम से निकलने वाली चीज दूसरे काम में इस्तेमाल हो जाती है. पशुओं का गोबर खेत के लिए खाद बन सकता है. जबकि फसल के कुछ हिस्से पशुओं के चारे के काम आ सकते हैं. इससे खेती का खर्च घटता है और जमीन की सेहत भी बेहतर बनी रहती है.

मल्टी-लेयर और पॉलीहाउस तकनीक से डबल फायदा

मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है और इसका सीधा असर खेती पर भी देखने को मिल रहा है. ऐसे में किसान अब फसलों को मौसम की मार से बचाने के लिए पॉलीहाउस, शेडनेट और मल्टी लेयर खेती जैसी तकनीकों का सहारा ले रहे हैं. कई किसानों ने इन तरीकों को अपनाकर ऑफ सीजन सब्जियों की खेती की और अच्छी कमाई हासिल की. पॉलीहाउस के अंदर तापमान, धूप और नमी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. इससे तेज गर्मी, पाला, तेज हवा और बेमौसम बारिश का फसल पर असर कम हो जाता है. 

वहीं मल्टी लेयर खेती में एक ही जमीन पर अलग-अलग ऊंचाई पर कई फसलें उगाई जाती हैं. जमीन के नीचे अदरक, हल्दी और अरबी जैसी फसलें लगाई जा सकती हैं. इसके ऊपर मचान बनाकर खीरा, करेला और लौकी उगाई जाती है, जबकि सबसे ऊपर पपीता और अमरूद जैसे पौधे लगाए जा सकते हैं. इस तरीके से खेत की लगभग हर जगह का इस्तेमाल हो जाता है और किसान एक ही जमीन से एक साथ कई फसलों की पैदावार ले सकता है. इससे कम जमीन में ज्यादा उत्पादन और अलग-अलग फसलों से कमाई का मौका मिलता है.

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सरकारी सब्सिडी से लागत कम

इस तरह की खेती शुरू करने में शुरुआती खर्च जरूर आता है. लेकिन सरकारी योजनाओं की मदद से किसान पर पूरा आर्थिक बोझ नहीं पड़ता. पॉलीहाउस, ड्रिप सिंचाई पर अलग-अलग योजनाओं के तहत सब्सिडी मिल सकती है. ड्रिप सिंचाई की मदद से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है. जिससे पानी की बर्बादी कम होती है और फसल को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती रहती है. खासकर कम पानी वाले इलाकों में यह तरीका काफी काम का साबित हो सकता है. 

राष्ट्रीय बागवानी मिशन और कृषि विभाग की अलग-अलग योजनाओं के तहत पॉलीहाउस, ड्रिप, स्प्रिंकलर और पशुपालन से जुड़ी सुविधाओं पर किसानों को सब्सिडी मिल सकती है. किसान चाहें तो शुरुआत में अपनी जमीन और बजट के मुताबिक छोटे स्तर से इस खेती को शुरू कर सकते हैं. बाद में कमाई बढ़ने के साथ सब्जियां, फल, पशुपालन और दूसरी चीजों जोड़कर कमाई के और रास्ते बना सकते हैं.

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