भारत समेत दुनिया के कई देशों में चावल रोज के खाने का हिस्सा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी प्लेट तक पहुंचने वाले चावल को तैयार करने में कितना पानी इस्तेमाल होता है? धान की खेती में खेतों को लंबे समय तक पानी की जरूरत पड़ती है, इसलिए इसे ज्यादा पानी वाली फसलों में गिना जाता है. अलग-अलग जगह की मिट्टी, मौसम, खेती के तरीके और सिंचाई व्यवस्था के कारण पानी की मात्रा भी बदलती रहती है. आइए जानते है की 1 किलो चवाल उगाने में कितना पानी खर्च होता है.

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1 किलो चावल के लिए कितना पानी लगता है?

चावल की खेती में पानी आंकड़ा सुनकर कई लोग हैरान हो सकते हैं. आमतौर पर 1 किलो चावल के लिए करीब 2,500 लीटर पानी का Water Footprint बताया जाता है. इसमें सिर्फ खेत में डाला गया सिंचाई का पानी ही शामिल नहीं होता, बल्कि बारिश और फसल को तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले कुल पानी को भी गिना जा सकता है. यही वजह है कि अलग-अलग रिपोर्ट और जगहों पर यह आंकड़ा अलग मिलता है. इसलिए 2,500 लीटर को एक सामान्य अनुमान के तौर पर समझना चाहिए

चावल की खेती में पानी ज्यादा क्यों लगता है?

चावल दूसरी कई फसलों की तुलना में ज्यादा पानी मांगता है क्योंकि इसकी खेती के एक बड़े हिस्से में खेत में पानी बनाए रखा जाता है. खासकर पारंपरिक तरीके से धान उगाने में खेतों में पानी भरा रहने से खरपतवार को कम करने भी मदद मिलती है. इसके अलावा पौधे की बढ़त और दाने बनने के समय पर्याप्त नमी जरूरी होती है. गर्म मौसम, ज्यादा वाष्पीकरण और पानी वाली मिट्टी जैसे कारणों से भी पानी की जरूरत बढ़ती है.

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क्या सारा पानी किसान खेत में डालता है?

नहीं, यह समझना जरूरी है कि 2,500 लीटर के आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि किसान हर किलो चावल के लिए 2,500 लीटर पानी खेत में पाइप या नहर से डालता है. Water Footprint में बारिश से मिलने वाला पानी, सिंचाई का पानी और फसल की पूरी प्रक्रिया से जुड़े पानी को अलग-अलग तरीके से देखा जाता है. इसलिए इस आंकड़े को सीधे सिंचाई के खर्च से जोड़ना सही नहीं होगा. किसी किसान के खेत में वास्तविक सिंचाई की जरूरत मिट्टी, बारिश, तापमान, फसल की किस्म और खेती के तरीके के हिसाब से काफी कम या ज्यादा हो सकती है.

पानी बचाने के लिए किसान क्या कर सकते हैं?

चावल की खेती में पानी बचाने के लिए खेती के तरीके में बदलाव किया जा सकता है. Alternate Wetting and Drying यानी AWD जैसी तकनीक में खेत में हर समय पानी भरा रखने के बजाय जरूरत के हिसाब से सिंचाई की जाती है. इससे पानी की बचत होती है. पानी बचाने वाली तकनीक अपनाने से किसान पानी की खपत कम करने के साथ खेती की लागत पर भी काम कर सकते हैं.

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